बुद्ध पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है ? जानिए पूजा विधि और महत्व

क्यों मनाई जाती हैं बुद्ध पूर्णिमा ?


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वैशाख पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा भी कहते हैं। यह गौतम बुद्ध की जयंती है और उनका निर्वाण दिवस भी। इसी दिन भगवान बुद्ध को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी। आज बौद्ध धर्म को मानने वाले विश्व में 50 करोड़ से अधिक लोग इस दिन को बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए बुद्ध विष्णु के नौवें अवतार हैं। अतः हिन्दुओं के लिए भी यह दिन पवित्र माना जाता है।

इसी कारण बिहार स्थित बोधगया नामक स्थान हिन्दू व बौद्ध धर्मावलंबियों के पवित्र तीर्थ स्थान हैं। गृहत्याग के पश्चात सिद्धार्थ सात वर्षों तक वन में भटकते रहे। यहाँ उन्होंने कठोर तप किया और अंततः वैशाख पूर्णिमा के दिन बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें बुद्धत्व ज्ञान की प्राप्ति हुई। तभी से यह दिन बुद्ध पूर्णिमा के रूप में जाना जाता है।



कोरोना संकट काल के बीच इस साल बुद्ध पूर्णिमा का त्योहार पड़ रहा है. कल यानी 7 मई को बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए ये त्योहार खास होगा. हालांकि लॉकडाउन के चलते उन्हें अपने घरों से ही पर्व को मनाने की मजबूरी होगी. तो वहीं हिंदू धर्मावलंबियों की भीड़ भी फल्गु नदी के तट पर नहीं जुटेगी.

वैशाख महीने की पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा का त्योहार मनाया जाता है. बुद्ध पूर्णिमा के पीछे गौतम बुद्ध से जुड़ी कई बाते हैं. इसी दिन गौतम बुद्ध की जयंती और निर्वाण दिवस पड़ता है. इसके साथ ही इसी दिन उन्हें ज्ञान की भी प्राप्ति हुई थी. बुद्ध के विष्णु के नौवें अवतार होने की वजह से हिंदुओं के यहां भी इस दिन को पवित्र माना जाता है. गौतम बुद्ध का जीवन संघर्ष, तपस्या और त्याग से भरा पड़ा है. उनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था. उनका जन्म कपिलवस्तु के पास लुम्बिनी में हुआ. 27 साल की उम्र में उन्होंने घर छोड़कर संन्यासी का रूप धारण कर लिया. संन्यासी बनने के बाद उन्होंने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया. उन्होंने चार आर्य सत्यों की शिक्षा दी.

अलग-अलग देशों में बुद्ध पूर्णिमा के समारोह स्थानीय रीति-रिवाजों और संस्कृति के हिसाब से संपन्न होते हैं. बोधगया में गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति होने के चलते हिंदू और बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए ये स्थान बहुत अहम माना जाता है. बुद्ध् पूर्णिमा के दिन हजारों की संख्या में हिंदू आकर यहां पिंडदान करते हैं. कहा जाता है कि फल्गु नदी के तट पर पिंडदान करने वाले व्यक्ति के मृतकों को मोक्ष की प्राप्ति होती है. वहीं बुद्ध को माननेवाले भी विश्व भर से बोधगया आकर विशेष पूजा और प्रार्थना करते हैं. तो कल गौतम बुद्ध के माननेवालों को लॉकडाउन में रहते हुए घरों पर ही त्योहार मनाना पड़ेगा. इस बार फल्गु के तट पर श्रद्धालुओं का तांता नजर नहीं आएगा.

बुद्धपूर्णिमा  का इतिहास


भगवान बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में नेपाल के कपिलवस्तु स्थित लुम्बिनी नामक स्थान में हुआ था। इनके पिता का नाम शुद्धोधन था, जो कि शाक्य गण के प्रमुख थे और माता का नाम माया देवी था। जब सिद्धार्थ ( बुद्ध के बचपन का नाम) महज सात दिन के थे। उसी समय इनकी माता की मृत्यु हो गई। इसके बाद इनका लालन-पालन इनकी सौतेली मां प्रजापति गौतमी ने किया था।बुद्ध महज 29 साल की उम्र में संन्यासी बन गए और बोधगया में पीपल वृक्ष के नीचे 6 वर्ष तक कठिन तपस्या की। इसके बाद उन्हें वैशाख पूर्णिमा के दिन सत्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। जिस पीपल वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई, उसे बोधि वृक्ष कहा जाता है। तत्कालीन समय में यह स्थान बिहार राज्य के गया जिले में स्थित है। भगवान बुद्ध ने पहला उपदेश सारनाथ में दिया था। चीरकाल में भगवान बुद्ध 483 ईसा पूर्व में वैशाख पूर्णिमा के दिन पंचतत्व में विलीन हो गए। इस दिन को परिनिर्वाण दिवस कहा जाता है।

कहां कहां मनाई जाती है बुद्धपूर्णिमा 

भारत के साथ साथ चीन, नेपाल, सिंगापुर, वियतनाम, थाइलैंड, जापान, कंबोडिया, मलेशिया, श्रीलंका, म्यांमार, इंडोनेशिया, पाकिस्तान जैसे दुनिया के कई देशों में बुद्ध पूर्णिमा के दिन बुद्ध जयंती मनाई जाती है. भारत के बिहार राज्य में स्थित बोद्ध गया बुद्ध के अनुयायियों सहित हिंदुओं के लिये भी पवित्र धार्मिक स्थल है. कुशीनगर में बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर लगभग एक माह तक मेला लगता है. हालांकि लॉकडाउन की वजह से इस साल मेले का आयोजन नहीं किया गया है. श्रीलंका जैसे कुछ देशों में इस उस्तव को वेसाक उत्सव के रूप में मनाते हैं. बौद्ध अनुयायी इस दिन अपने घरों में दिये जलाते हैं और फूलों से घर सजाते हैं. इस दिन बौद्ध धर्म ग्रंथों का पाठ किया जाता है.

बौद्ध धर्म के मुख्य तीर्थस्थल

बौद्धों के लिए, बोध गया नामक स्थान गौतम बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित सर्वाधिक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है. बोधगया के अतिरिक्त, कुशीनगर, लुम्बिनी तथा सारनाथ भी अन्य तीन महत्वपूर्ण तीर्थस्थल हैं. माना जाता है कि गौतम बुद्ध ने बोधगया में ज्ञान प्राप्त किया तथा उन्होंने पहली बार सारनाथ में धर्म की शिक्षा दी.
बुद्ध पूर्णिमा के दिन कैसे करें पूजा
  •  घर के मंदिर में विष्णु जी की दीपक जलाकर पूजा करें और घर को फूलों से सजाएं.
  • घर के मुख्य द्वार पर हल्दी, रोली या कुमकुम से स्वस्तिक बनाएं और गंगाजल छिड़कें.
  • बोधिवृक्ष के आस-पास दीपक जलाएं और उसकी जड़ों में दूध विसर्जित कर फूल चढ़ाएं.
  • गरीबों को भोजन और कपड़े दान करें.
  • रौशनी ढलने के बाद उगते चंद्रमा को जल अर्पित करें.

बुद्ध पूर्णिमा कब है

हिन्‍दू पंचांग के अनुसार वैशाख महीने की पूर्णिमा (Vaishakha Purnima) को बुद्ध पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है. ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार बुद्ध पूर्णिमा हर साल अप्रैल या मई महीने में आती है. इस बार बुद्ध पूर्णिमा 7 मई को है. 

बुद्ध पूर्णिमा की तिथि और शुभ मुहूर्त 

बुद्ध पूर्णिमा की तिथि: 7 मई 2020
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 6 मई 2020 को शाम 7 बजकर 44 मिनट से 
पूर्णिमा तिथि समाप्‍त: 7 मई 2020 को शाम 04 बजकर 14 मिनट तक 


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